سلمانیان

دل نوشته های یک عاشق ساده و بس

 
فاطمیه
نویسنده : رضا سوری - ساعت ٧:۳٥ ‎ق.ظ روز ۱۳٩۱/۱/٢٩
 
سوگواره ها ی فاطمیه:
زیر باران دوشنبه بعد از ظهر
 
اتفاقی مقابلم رخ داد.......
 

زیر باران دوشنبه بعد از ظهر
 
اتفاقی مقابلم رخ داد
 
وسط کوچه ناگهان دیدم
 
زن همسایه بر زمین افتاد
 
 
 
سیب‌ها روی خاک غلطیدند
 
چادرش در میان گرد و غبار
 
قبلا این صحنه را... نمی‌دانم
 
در من انگار می‌شود تکرار
 
 
 
آه سردی کشید، حس کردم
 
کوچه آتش گرفت از این آه
 
و سراسیمه گریه در گریه
 
پسر کوچکش رسید از راه
 
 
 
گفت: آرام باش! چیزی نیست
 
به گمانم فقط کمی کمرم...
 
دست من را بگیر، گریه نکن
 
مرد گریه نمی‌کند پسرم
 
 
 
چادرش را تکاند، با سختی
 
یا علی گفت و از زمین پا شد
 
پیش چشمان بی‌تفاوت ما
 
ناله‌هایش فقط تماشا شد
 
 
 
صبح فردا به مادرم گفتم
 
گوش کن! این صدای روضه‌ی کیست
 
طرف کوچه رفتم و دیدم
 
در و دیوار خانه‌ای مشکی است
 
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با خودم فکر می‌کنم حالا
 
کوچه ما چقدر تاریک است
 
گریه، مادر، دوشنبه، در، کوچه
 
راستی! فاطمیه نزدیک است...
 
 
 
 
 
 

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بس حال قیام سحرم مثل رکوع است 
این قوس کمان را قد محراب ندارد
تابوت بیارید که آماده ی مرگم
چشمان به در مانده ی من خواب ندارد
 

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آنروز تمام آسمان نیلی بود 
بر دوش علی بیعت تحمیلی بود
وقتی ثمر باغ فدک قسمت شد 
ای وای که سهم فاطمه سیلی بود

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مولا از قبیله بی قبله خسته بود
یک کشف تازه قلب علی را شکسته بود 
شب،غسل مخفیانه،جراحات تازه تر
قرآن زخم خورده و آیات تازه تر

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از گریه عرش آسمان دریا شد
یک قطره چکید و مثل عاشورا شد
با شال عزا مرد غریبی می گفت
ایام عزای مادرم زهرا شد

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ما گوشه نشینان غم فاطمه ایم
محتاج عطا و کرم فاطمه ایم
یک عمر چو شو شمع اگر بسوزیم،کم است
دلسوخته ی عمر کم فاطمه ایم

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ایستادم به نوک پنجه ی پا،اما حیف!
دستش از روی سرم رد شد و بر مادر خورد ...............
 
 
 
 
 

السلام علیک ایتها الصدیقة الشهیدة
آجرک الله یا بقیة الله
آقاجان سرتان به سلامت

 
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